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हिमालयी राज्यों के लिए जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाली CO2 के फायदे या नुकसान? जानिए क्या कह रहे वैज्ञानिक?

tapobhoomi June 5, 2026 1 min read

किस तरह से जियोथर्मल स्प्रिंग्स से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड हिमालयी राज्यों के लिए हो सकती है वरदान! पढ़िए रोहित सोनी की रिपोर्ट

देहरादून: हर साल देश और दुनिया में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. ताकि, लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके, लेकिन पर्यावरण संरक्षण आज देश और दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. क्योंकि, वाहनों के धुएं, जंगल की आग और बढ़ते पर्यटन की वजह से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड उत्तराखंड जैसे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण पर गहरा असर डाल रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा शिकार हिमालय के ग्लेशियर हो रहे हैं. मानवीय गतिविधियों के साथ ही हिमालय भी बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर रहा है, जो भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है.

यही वजह है कि वैज्ञानिक और पर्यावरणविद जियोजनिक कार्बन डाइऑक्साइड को टैप कर इसके व्यवसायीकरण पर जोर दे रहे हैं. देश और दुनिया में लगातार कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन की मात्रा बढ़ती जा रही है, जो वातावरण में जाकर सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने का काम कर रहा है. यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर कार्बन एमिशन को कम किए जाने पर जोर दे रहे हैं.

इसी कड़ी में भारत में भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोलर एनर्जी और ईवी वाहनों कई बढ़ावा दिया जा रहा है. ताकि, कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन पर लगाम लगायी जा सके. वहीं, उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र भी न सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, बल्कि बड़ी मात्रा में उसका उत्सर्जन भी करते हैं, जो वैज्ञानिकों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक कर चुके जियोथर्मल स्प्रिंग्स पर अध्ययन: अमूमन तौर पर यह अवधारणा रहती है कि हिमालय कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित करते हैं. इसी अवधारणा को लेकर वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने हिमालय में मौजूद जियोथर्मल स्प्रिंग्स पर अध्ययन किया था. जिसमें वैज्ञानिकों ने पाया था कि,

भले ही हिमालय में मौजूद पेड़-पौधे और नदियां कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर रही हों, लेकिन हिमालय में मौजूद जियोथर्मल स्प्रिंग्स बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी करते हैं. हालांकि, ये प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से सामान्य है, लेकिन मानवीय गतिविधियों की वजह से अब कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पर्यावरण में बढ़ती जा रही है. जिसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग या क्लाइमेट चेंज आज देश-दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.

उत्तराखंड में मौजूद हैं करीब 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स: उत्तराखंड में मौजूद करीब 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स भले ही कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हों, लेकिन ये हिमालय के लिए वरदान भी हैं. क्योंकि, हिमालय में मौजूद पेड़ पौधों की तेजी से ग्रोथ, जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड से ही होती है, लेकिन बढ़ती मानवीय गतिविधियों की वजह से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है.

इसका एक पहलू ये भी है कि जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाला जियोजेनिक कार्बन डाइऑक्साइड, इकोनामी का एक बड़ा जरिया भी बन सकता है. यानी इस जियोजेनिक कार्बन डाइऑक्साइड को टैप करके इसका व्यवसायीकरण किया जा सकता है. इससे इकोनॉमी के साथ-साथ लोगों को रोजगार भी मिलेगा, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है.

वातावरण में बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड: वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड को लेकर वैज्ञानिक इस वजह से भी चिंतित हैं, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग को और बढ़ाने में कार्बन डाइऑक्साइड समेत अन्य ग्रीन हाउस गैसेस की महत्वपूर्ण भूमिका है. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से न सिर्फ तापमान बढ़ता है बल्कि, इसके तमाम अन्य साइड इफेक्ट भी हैं, जो वर्तमान समय में देश दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में देखे जा रहे हैं.

कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से सामने आते हैं कई गंभीर दुष्प्रभाव: वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से तापमान में वृद्धि होती है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं. इसके अलावा बाढ़ और जल संकट के साथ ही वायु प्रदूषण और तापमान बढ़ने से मौसम चक्र में भी बदलाव होता है. जिसके चलते कृषि पर भी इसका गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता है.

‘पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ने से जो क्लाइमेटिक चेंजेज हो रहे हैं, वो पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का विषय बने हुए हैं. ऐसे में अगर जल्द ही कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसेस के उत्सर्जन पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य बहुत ही अंधकारमय हो सकता है.’

“ग्रीनहाउस गैस के पर्यावरण में ज्यादा होने से न सिर्फ जल संकट उत्पन्न हो सकता है, बल्कि तापमान बढ़ने से फसलों के चक्र पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा जो जानवर या जीव इकोसिस्टम के आदी हो जाते हैं, उनके लिए भी बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है.“- प्रो. एके बियानी, पर्यावरणविद

“पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने के पीछे तमाम कारण हैं. मुख्य रूप से हाल ही में जो युद्ध हो रहे हैं, उससे काफी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पर्यावरण में रिलीज हुआ है, इसको भी एक बड़ा फैक्ट माना जाना चाहिए. इस युद्ध की वजह से जो बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पर्यावरण में रिलीज हुई है, उसका जिम्मेदार कौन है?“- प्रो. एके बियानी, पर्यावरणविद

“इसके अलावा इंडस्ट्रियल एक्टिविटी, पेट्रोल और कोल के इस्तेमाल की वजह से भी कार्बन डाइऑक्साइड काफी ज्यादा रिलीज हो रही है. इतना ही नहीं जियोथर्मल स्प्रिंग्स से भी बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज हो रही है. इसके अलावा डैम बनने से भी पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है.“- प्रो. एके बियानी, पर्यावरणविद

उनका कहना है कि कुल मिलाकर ‘भविष्य को देखते हुए कार्बन डाइऑक्साइड के बेतहाशा उत्सर्जन पर रोक लगनी चाहिए.’ वर्तमान समय में तमाम तरह की टेक्नोलॉजी मौजूद हैं, जिसके जरिए कार्बन डाइऑक्साइड को टैप कर कमर्शियल यूज भी किया जा सकता है. इस दिशा में भारत में भी प्रयास करने की जरूरत है. ताकि, कार्बन डाइऑक्साइड का यूटिलाइज बेहतर ढंग से किया जा सके. जिससे पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में कमी आएगी.

वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. समीर तिवारी ने कहा कि,

“जियोथर्मल स्प्रिंग से कार्बन डाइऑक्साइड का निकलना एक जियोजेनिक प्रक्रिया है, जिसको रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा इंसान आज प्रकृति में दखल दे रहा है. हालांकि, ये एक अच्छी बात है कि हिमालय में जियोजेनिक कार्बन डाइऑक्साइड का भंडार है, जिसको भविष्य में कमर्शियल रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है.”- डॉ. समीर तिवारी, वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

उन्होंने बताया कि जब वो आइसलैंड में थे, उस दौरान उन्होंने देखा कि ‘जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाले जियोजेनिक कार्बन डाइऑक्साइड को टैप करके कमर्शियल यूज के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में हिमालय में मौजूद जियोजेनिक कार्बन डाइऑक्साइड को इकोनॉमी से जोड़ा जा सकता है.’ हालांकि, जियोजनिक कार्बन डाइऑक्साइड के व्यवसायीकरण के लिए हमें जियोथर्मल स्प्रिंग्स पर प्लांट लगाने होंगे. ताकि, इसको टैप करके इसका व्यवसायीकरण किया जा सके.

 जिले में स्थित जियोथर्मल स्प्रिंग (फोटो सोर्स- Wadia Institute of Himalayan Geology)

“जियोथर्मल स्प्रिंग्स सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करते हैं, बल्कि एनर्जी के भी स्रोत हैं. हिमालय में मौजूद जियोथर्मल स्प्रिंग्स पर ऐसा कोई प्लांट अभी तक नहीं बन पाया, जिसके जरिए एक बल्ब भी जलाया जा सकता है.“ डॉ. समीर तिवारी, वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

“इस दिशा में तमाम काम हुए हैं, लेकिन अभी तक फाइनल आउटपुट नहीं आ पाया है. ऐसे में अगर यह थर्मल स्प्रिंग्स पर ऊर्जा उत्पादन के लिए कोई प्लांट लगते हैं, तो उस दौरान ही कार्बन डाइऑक्साइड को टैप करके उसका व्यवसायीकरण कर सकते हैं.“- डॉ. समीर तिवारी, वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड का हिमालय पर क्या असर? उन्होंने बताया कि जिस-जिस इंडस्ट्री में कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल होता है, उनको ये कार्बन डाइऑक्साइड बेची जा सकती है. वैज्ञानिक डॉ. समीर तिवारी ने जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड के हिमालय पर पड़ने वाले असर की जानकारी भी दी. उन्होंने बताया कि,

“जियोथर्मल स्प्रिंग से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड हिमालय के लिए वरदान भी है. क्योंकि, हिमालय में वनों का तेजी से जो ग्रोथ होती है, वो इन्हीं कार्बन डाइऑक्साइड की वजह से होती है. ऐसे में हिमालय सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित ही नहीं करता, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी करता है.“- डॉ. समीर तिवारी, वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

प्रकृति ने बैलेंस करके रखा है, तो इंसान कर रहा डिसबैलेंस: इसके अलावा उन्होंने बताया कि प्रकृति ने कार्बन डाइऑक्साइड समेत अन्य गैसों को बैलेंस करके रखा है, लेकिन इंसान इसको डिसबैलेंस कर रहा है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में कार्बन डाइऑक्साइड की वजह से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या और ज्यादा बढ़ जाएगी.

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