कौसानी का लक्ष्मी आश्रम आज तक सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाया है. जिससे यहां रहने वाले लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है.![]()
बागेश्वर: जनपद के लक्ष्मी आश्रम ने दशकों से महिला शिक्षा, स्वावलंबन और गांधीवादी मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. साल 1946 में स्थापित यह आश्रम ग्रामीण बालिकाओं और महिलाओं को शिक्षा, कौशल विकास तथा आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण प्रदान करता है. आश्रम की स्थापना गांधीवादी कार्यकर्ता सरला बहन ने की थी. यहां पर्यावरण संरक्षण, ग्राम विकास और महिला अधिकारों पर भी निरंतर कार्य किया जाता है. हिमालय की सुंदर वादियों के बीच स्थित यह आश्रम आज भी सामाजिक परिवर्तन और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायी केंद्र बना हुआ है. इसी के इतर आज भी ये आश्रम मूलभूत सुविधाओं से महरूम है और सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाया है.
गौर हो कि महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन (कैथरीन मैरी हाईलामन) की ओर से 5 दिसंबर 1946 को स्थापित यह आश्रम अपने स्थापना काल के लगभग 80 वर्ष बाद भी पक्की सड़क की प्रतीक्षा कर रहा है. मुख्य सड़क से आश्रम की दूरी महज डेढ़ किलोमीटर है,आश्रम में वर्तमान में 50 से अधिक बालिकाएं आवासीय शिक्षा के साथ स्वावलंबन का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं.कौसानी बाजार से आश्रम तक पहुंचने के लिए डेढ़ किलोमीटर की खड़ी और पथरीली चढ़ाई पार करनी पड़ती है. मार्ग पक्का न होने के कारण बरसात के दिनों में यह रास्ता कीचड़ और मलबे से भर जाता है.
आश्रम तक राशन, दवाइयां, निर्माण सामग्री और खादी उत्पाद आज भी मजदूरों अथवा आश्रम की कार्यकर्तियों को सिर पर ढोकर पहुंचाने पड़ते हैं. किसी छात्रा या शिक्षक के बीमार होने पर स्थिति और भी गंभीर हो जाती है. वाहन पहुंचने की सुविधा न होने के कारण मरीजों को स्ट्रेचर या डोली के सहारे डेढ़ किलोमीटर नीचे सड़क तक लाना पड़ता है. प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर मरीजों को करीब 30 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है, जिसमें यह दुर्गम पैदल मार्ग सबसे बड़ी बाधा साबित होता है. आश्रम के कई आजीवन कार्यकर्ता अब 90 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं.
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और पद्मश्री सम्मानित राधा बहन भट्ट 95 वर्ष की उम्र में भी आश्रम में रह रही हैं. उनके नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए भी उन्हें नीचे सड़क तक लाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. आश्रम से जुड़े लोगों का कहना है कि सड़क सुविधा के अभाव और समय पर समुचित चिकित्सा न मिल पाने के कारण पिछले दो महीनों में हॉपकिंस और कांति बहन भट्ट का निधन भी हो चुका है. एक ओर राज्य सरकारें मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत दूरस्थ क्षेत्रों तक सड़क पहुंचाने के दावे कर रही हैं, वहीं आज तक इस आश्रम तक रोड नहीं पहुंच पाई है.
पद्मश्री राधा बहन भट्ट, लक्ष्मी आश्रम कौसानी ने बताया कि साल 1951 से इस आश्रम में प्रवास कर रही हूं. स्त्री शिक्षा, पर्यावरण और स्वावलंबन के लिए किए गए कार्यों के लिए सरकारों ने पद्म पुरस्कार देकर सम्मान तो बढ़ाया लेकिन हमारी बुनियादी जरूरत को हमेशा नजरअंदाज किया. हमारे प्रयासों से वर्षों पूर्व प्रशासन ने इस सड़क मार्ग का बकायदा सर्वे भी कराया था. वह फाइल आज किस दफ्तर में धूल खा रही है इसका कुछ भी अता-पता नहीं है. इस चुनावी वर्ष में उम्मीद है कि सरकार हमारी इस मांग को पूरा करेगी.
