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उत्तराखंड के जंगलों में आग का भयंकर तांडव, 3 महीने में 300 घटनाएं रिकार्ड, 239 हेक्टेयर वन क्षेत्र राख

tapobhoomi May 21, 2026 1 min read

उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन के पहले तीन महीनों में जंगल में आग लगने की 300 घटनाएं दर्ज की गईं. गढ़वाल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित.

देहरादून: उत्तराखंड में एक बार फिर जंगल धधक रहे हैं. हरियाली और ठंडी हवा का सुकून देने वाली पहाड़ों की वादियां आग की लपटें और धुएं का गुबार दे रही है. राज्य में फायर सीजन शुरू होने के बाद से वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. हालात ऐसे हैं कि गढ़वाल से कर कुमाऊं तक कई जिलों के जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं.

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 15 फरवरी से अभी तक प्रदेश में 300 वनाग्नि की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें करीब 239.47 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है. वन विभाग और मौसम विभाग दोनों ही इस बार के फायर सीजन को बेहद संवेदनशील मान रहे हैं. लगातार बढ़ता तापमान, लंबे समय से बारिश न होना और सूखी वनस्पति ने जंगलों को बारूद की तरह ज्वलनशील बना दिया है.

गढ़वाल के जंगलों में सबसे ज्यादा आग: इस बार सबसे ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं गढ़वाल मंडल में दर्ज की गई हैं. पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी के जंगल लगातार आग की चपेट में आए हैं. कई इलाकों में रात के समय पहाड़ों पर आग की लंबी लपटें दूर-दूर तक दिखाई दे रही हैं. जंगलों में उठता धुआं अब रिहायशी इलाकों तक पहुंचने लगा है, जिससे स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है.

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, गढ़वाल क्षेत्र में कई जगह आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करने में घंटों लग रहे हैं. कठिन पहाड़ी इलाके और दुर्गम रास्तों के कारण फायर टीमों को मौके तक पहुंचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. कई स्थानों पर कर्मचारियों को घंटों पैदल चलकर जंगलों तक पहुंचना पड़ रहा है. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा प्रभावित वन प्रभागों में डीएफओ गढ़वाल, पिथौरागढ़, बदरीनाथ, कालसी और रुद्रप्रयाग क्षेत्र शामिल है. इन इलाकों में कई हेक्टेयर वन भूमि आग की भेंट चढ़ चुकी है.

वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि,

प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उसके बाद भी वनाग्नि की घटनाओं में कमी आई है. इसके पीछे पिछले 4 साल का वर्क है. विभाग ने डीएम के नेतृत्व में कमेटियां, ग्राम प्रधान के नेतृत्व में फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट कमेटियां और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को जिलों में नोडल अधिकारी बनाया है. उनके अनुभव का फायदे के साथ जिले में कर्मियों में अनुशासन बना हुआ है.

फायर वॉचर का 10 लाख रुपए का बीमा और उन्हें फायर सुट्स, फायर जैकेट्स फायर इक्विपमेंट्स से लैस करने का काम किया है. इससे कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ा है और सभी पूरी तरह से फॉरेस्ट फायर को कम करने के लिए काम कर रहे हैं. वन विभाग को पूरा विश्वास है कि पिछले साल के तरह ही इस साल भी आग की घटनाओं में अंकुश लगाने में कामयाब होंगे.
– सुबोध उनियाल, वन मंत्री –

मौसम बना सबसे बड़ा संकट: उत्तराखंड में इस बार मौसम की बेरुखी भी जंगलों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है. मौसम विभाग के अनुसार, पिछले कई दिनों से प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में बारिश नहीं हुई है. लगातार तेज धूप और गर्म हवाओं ने जंगलों की नमी खत्म कर दी है.

मौसम वैज्ञान देहरादून के निदेशक डॉ. सीएस तोमर का कहना है,

अगले कुछ दिनों में बारिश की संभावना तो है लेकिन इतनी नहीं की राज्य को रहत मिले. लोगों को ऐसे मौसम में सतर्क रहने की जरूरत है. तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान है. इसका सीधा असर जंगलों पर पड़ रहा है. सूखी घास, पत्तियां और चीड़ पिरूल मामूली चिंगारी से भी तुरंत आग पकड़ रही हैं.
-डॉ. सीएस तोमर, निदेशक, मौसम वैज्ञान देहरादून-

मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के मुताबिक,

पर्वतीय क्षेत्रों में हल्की बारिश की संभावना जरूर है. लेकिन उससे बड़े स्तर पर राहत मिलने की उम्मीद कम है. मैदानी जिलों में गर्मी और अधिक बढ़ सकती है. ऐसे में वनाग्नि की घटनाएं आने वाले दिनों में और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
-रोहित थपलियाल, मौसम वैज्ञानिक-

आखिर क्यों बार बार जलते हैं उत्तराखंड के जंगल: गर्मी के सीजन में उत्तराखंड में जंगलों में आग लगना कोई नई बात नहीं है. लेकिन हर साल इसका दायरा बढ़ता जा रहा है. इसके पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण जिम्मेदार हैं. राज्य के बड़े हिस्से में चीड़ के जंगल फैले हुए हैं. चीड़ के पेड़ों से निकलने वाला लीसा अत्यधिक ज्वलनशील होता है. गर्मियों में जब जंगल सूख जाते हैं तो यही लीसा और सूखी पत्तियां आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं.

इसके अलावा मानव गतिविधियां भी आग की बड़ी वजह बन रही है. जंगलों से गुजरने वाले लोग बीड़ी, सिगरेट या जलती माचिस फेंक देते हैं. जिससे आग लग जाती है. कई बार ग्रामीण नई घास उगाने के उद्देश्य से जंगलों में आग लगा देते हैं. लेकिन यही आग बाद में बेकाबू होकर बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है.

वन अधिकारियों का कहना है कि, जलवायु परिवर्तन भी अब वनाग्नि की घटनाओं को बढ़ाने वाला बड़ा कारण बन चुका है. समय पर बारिश नहीं होने से जंगलों में नमी कम हो रही है और तापमान बढ़ने से आग तेजी से फैल रही है.

लगभग 240 से अधिक हेक्टेयर जंगल जलकर राख: 15 फरवरी से शुरू हुए फायर सीजन में अब तक करीब 239.47 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जल चुका है. इसके अलावा लगभग 3.5 हेक्टेयर पौधरोपण क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है. वन विभाग के अनुसार, कई स्थानों पर नए लगाए गए हजारों पौधे आग में नष्ट हो गए हैं. चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में लगी भीषण आग ने वन विभाग की चिंताएं बढ़ा दी हैं. यहां पश्चिमी पिंडर रेंज और बदरीनाथ वन प्रभाग के जंगलों में लगातार दो दिनों तक आग धधकती रही. आग की चपेट में आने से हजारों छोटे पौधे जलकर राख हो गए.

वन विभाग का कहना है कि, लगातार तेज हवाओं और गर्म मौसम के कारण आग पर काबू पाने में मुश्किलें आ रही हैं. विभागीय टीमें लगातार जंगलों में डटी हुई हैं और आग बुझाने का काम जारी है. वन क्षेत्र अधिकारी अखिलेश के मुताबिक,

फिलहाल आग जहां जहां लगी है, वहां से बुझा ली गई है. सभी कर्मचारियों को संवेदनशील जगह पर तैनात किया गया है.
-अखिलेश, वन क्षेत्राधिकारी, बदरीनाथ वन प्रभाग-

रातभर आग से लड़ते रहे फायर कर्मी: रानीखेत से सामने आए एक वीडियो ने जंगलों में आग बुझाने की कठिन हकीकत को उजागर भी किया. वीडियो में फायर सर्विस और वन विभाग की टीमें दुर्गम पहाड़ियों में रातभर आग बुझाती नजर आईं. कई जगह सड़क और वाहन पहुंचने का रास्ता नहीं होने के कारण कर्मचारियों को पेड़ों की टहनियों से आग बुझानी पड़ी. घना जंगल, अंधेरा और ऊबड़-खाबड़ रास्ते राहत कार्य में बड़ी चुनौती बने हुए हैं. कई बार आग इतनी तेजी से फैलती है कि कर्मचारियों को अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है.

पौड़ी और चमोली में बिगड़े हालात: पौड़ी जिले के बुआखाल और पौड़ी-देवप्रयाग मोटर मार्ग के आसपास जंगलों में भीषण आग देखने को मिली रही है. आग की लपटें सड़क किनारे जंगलों से लेकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रही है. दूर-दूर तक धुएं का गुबार दिखाई दे रहा है. इसी तरह चमोली जिले के कई गांवों के जंगल भी आग की चपेट में आ गए हैं. कौब, लेगुना, केशपुर, छैकुड़ा और नलगांव क्षेत्र में जंगल जल रहे हैं.

वन विभाग की टीमों ने घंटों मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश की. इस आग से लगातार वन्यजीव भी प्रभावित हो रहे हैं. जंगली जानवर पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में आबादी की ओर आने लगे हैं. जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ रहा है.

वन विभाग हाई अलर्ट पर: वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने प्रदेशभर में हाई अलर्ट जारी किया है. विभाग की ओर से 1438 फॉरेस्ट फायर स्टेशन सक्रिय किए गए हैं. इसके अलावा, करीब 5600 फॉरेस्ट फायर वॉलेंटियर भी आग बुझाने के काम में लगाए गए हैं. राज्य में लगभग 40 मास्टर फायर कंट्रोल रूम बनाए गए हैं. जहां से लगातार निगरानी की जा रही है. वन विभाग का दावा है कि हर सूचना पर तुरंत टीमों को रवाना किया जा रहा है.

मुख्य वन संरक्षक और आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक का कहना है कि,

विभाग की पूरी टीम लगातार जंगलों में लगी आग को नियंत्रित करने में जुटी हुई है. सबसे ज्यादा ध्यान उन इलाकों पर दिया जा रहा है. जहां आग आबादी के करीब पहुंच रही है.
-सुशांत पटनायक, नोडल अधिकारी-

अनिल बालूनी का भी हुआ आग से सामना: इससे पहले 17 मई रविवार को आग से सामना गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी का भी हुआ था. उनका एक वीडियो खूब वायरल भी हुआ. मामला तब का है जब वे पौड़ी से कोटद्वार लौट रहे थे. तभी रास्ते में उन्हें जंगलों में भीषण आग लगी दिखाई दी. इस पर उन्होंने वहीं से खड़े होकर वन विभाग के अधिकारियों से फोन पर संपर्क कर आग पर जल्द से जल्द काबू पाने की बात कही.

आने वाले दिन और चुनौतीपूर्ण: यदि अगले कुछ दिनों तक बारिश नहीं हुई तो उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाएं और विकराल रूप ले सकती हैं. तापमान लगातार बढ़ रहा है. जंगलों में नमी लगभग खत्म हो चुकी है. पर्यावरणविदों का कहना है कि, वनाग्नि सिर्फ जंगलों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर वन्यजीवों, पर्यावरण, जल स्रोतों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. जंगलों में लगने वाली आग से बड़ी मात्रा में धुआं वातावरण में फैलता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और पहाड़ी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है.

फिलहाल पूरा उत्तराखंड एक कठिन फायर सीजन से गुजर रहा है. वन विभाग, फायर सर्विस और स्थानीय लोग मिलकर आग बुझाने की कोशिशों में जुटे हैं. लेकिन मौसम का साथ न मिलने से चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है.

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